Saturday, November 2, 2019

छठ में सूर्य के सामने खड़े होना निरोगी बनाता है, दुनिया भी इसे अपना रही: हार्वर्ड के प्रोफेसर

पटना. डेविड सिंक्लेयर हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में जेनेटिक विभाग के प्रोफेसर हैं। वे टाइम मैग्जीन के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में हैं। उनकी किताब लाइफस्पैन एक महीने में ही न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर बन चुकी है। सिंक्लेयर का मानना है कि निरोगी होने का सबसे बड़ा फॉर्मूला उपवास है। इस मामले में भारत के लोग भाग्यशाली हैं, उन्हें व्रत विरासत में मिले हैं। छठ-पूजा पर प्रोफेसर सिंक्लेयर से रितेश शुक्ल ने व्रत के वैज्ञानिक पक्ष पर बात की....

सवाल- हमारे यहां छठ पर 36 घंटे व्रत और सूर्य को अर्ध्य देने की परंपरा है। इसे कैसे देखते हैं?
जवाब-
उपवास सिर्फ भारतीय संस्कृति का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि दुनिया की कई सभ्यताओं में यह परंपरा है। पर हिंदुओं में हर हफ्ते किसी दिन या पर्व विशेष पर व्रत रखने का चलन है, कुछ में दिन में एक बार खाने का रिवाज है। इसे हम इंटमिंटेट फास्टिंग कहते हैं। रिसर्च से यह साबित हुआ है कि व्रत के दौरान जरूरी जींस शरीर को फायदा पहुंचाने को सक्रिय हो जाते हैं। सूर्य किरणें भी शरीर में मौजूद ऐसे जींस को सक्रिय करती हैं।

सवाल- भूख-सूर्य ऊर्जा से जींस कैसे सक्रिय होते है?
जवाब-
व्रत करने से और शरीर को सूर्य स्नान कराने से कोशिकाओं में सिट्इन जीन सक्रिय होते हैं और सुस्त पड़ी कोशिकाओं को सक्रिय कर देते हैं। इससे बॉडी की मरम्मत क्षमता बढ़ती है। इसके लिए जरूरी विटामिन डी का एकमात्र स्रोत सूर्य ही है। इस प्रक्रिया से आप निरोगी रहकर लंबा जीवन जी सकते हैं।

सवाल- क्या इस प्रक्रिया पर कोई रिसर्च हुई है?
जवाब-
हां, हमने खमीर (यीस्ट) और चूहों पर यह प्रयोग किया है। चूहों को दो ग्रुपर में रखा गया। एक ग्रुप के चूहों को बेहद कम और दूसरे को भरपेट भोजन दिया गया। फिर चूहों की कीमोथैरेपी की दवा दी गई। नतीजे चौकाने वाले रहे। भूखे रहने वाले चूहे इस दवाई के प्रभाव को झेल गए और जल्द ही सामान्य हो गए। वहीं भरपेट भोजन करने वाले चूहों में से ज्यादातर सरवाइव नहीं कर पाए।

सवाल- इस जांच से क्या निष्कर्ष निकला?
जवाब-
मान लें आपका शरीर एक हाइटेक कार है। इस कार को कंट्रोल करने वाला सॉफ्टवेयर एपिजिनोम कहलाता है। यह शरीर के हर एक अंग की कोशिकाओं में मौजूद जींस को सक्रिय या निष्क्रिय करता है। ऐसा करने वाले जींस को सिट्इन कहते हैं। जब सिट्इन सुस्त पड़ने लगता है तब बुढ़ापे जैसी खतरनाक बीमारी हावी होने लगती है। भूख, गर्मी और सर्दी शरीर में सिट्इन को रिएक्टिवेट करते हैं। जिसके कारण शरीर की मरम्मत क्षमता बढ़ जाती है। जब तक शरीर में यह प्रक्रिया चलती रहती है, शरीर की उम्र जो भी हो, बुढ़ापा नहीं आता।

सवाल- आप बुढ़ापे को बीमारी कह रहे हैं?
जवाब-
हां, बुढ़ापा बीमारी है और हर आदमी को डराता है। फिर भी इस पर रिसर्च नहीं हो रही है। आप सोचिए 1995 तक औसतन हर व्यक्ति अपनी कुल जिंदगी में 80% सेहतमंद रहता था। ये स्थिति अब घटकर 60% के भी नीचे आ गई है। इसे दुनिया बुढ़ापे से जोड़कर देख रही है। जब हम बुढ़ापे को बीमारी मानेंगे, तभी इस पर शोध कर पाएंगे कि कैसे इंसान अपने जीवन में लंबे वक्त तक निरोगी रह सके।

सवाल- आप बुढ़ापे से दूर रहने के लिए क्या करते हैं?
जवाब-
मैं नाश्ते से परहेज करता हूं। लंबे अंतराल पर भोजन करता हूं। इसमें पानी और सीजनल फल और कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल 70% से अधिक करता हूं। रोज शरीर को भूख, गर्मी और सर्दी महसूस करवाता हूं। मेरी उम्र 50 साल हो चली है, पर ऊर्जा 30 साल जैसी है। मेरे 80 साल के पिता भी इसी फॉर्मूले पर चल रहे हैं। वे औसतन 40 साल के लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा फिट हैं।



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फाइल फोटो।
प्रोफेसर डेविड सिंक्लेयर। -फाइल


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