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Saturday, November 2, 2019

छठ में सूर्य के सामने खड़े होना निरोगी बनाता है, दुनिया भी इसे अपना रही: हार्वर्ड के प्रोफेसर

पटना. डेविड सिंक्लेयर हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में जेनेटिक विभाग के प्रोफेसर हैं। वे टाइम मैग्जीन के 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में हैं। उनकी किताब लाइफस्पैन एक महीने में ही न्यूयॉर्क टाइम्स की बेस्टसेलर बन चुकी है। सिंक्लेयर का मानना है कि निरोगी होने का सबसे बड़ा फॉर्मूला उपवास है। इस मामले में भारत के लोग भाग्यशाली हैं, उन्हें व्रत विरासत में मिले हैं। छठ-पूजा पर प्रोफेसर सिंक्लेयर से रितेश शुक्ल ने व्रत के वैज्ञानिक पक्ष पर बात की....

सवाल- हमारे यहां छठ पर 36 घंटे व्रत और सूर्य को अर्ध्य देने की परंपरा है। इसे कैसे देखते हैं?
जवाब-
उपवास सिर्फ भारतीय संस्कृति का ही हिस्सा नहीं है, बल्कि दुनिया की कई सभ्यताओं में यह परंपरा है। पर हिंदुओं में हर हफ्ते किसी दिन या पर्व विशेष पर व्रत रखने का चलन है, कुछ में दिन में एक बार खाने का रिवाज है। इसे हम इंटमिंटेट फास्टिंग कहते हैं। रिसर्च से यह साबित हुआ है कि व्रत के दौरान जरूरी जींस शरीर को फायदा पहुंचाने को सक्रिय हो जाते हैं। सूर्य किरणें भी शरीर में मौजूद ऐसे जींस को सक्रिय करती हैं।

सवाल- भूख-सूर्य ऊर्जा से जींस कैसे सक्रिय होते है?
जवाब-
व्रत करने से और शरीर को सूर्य स्नान कराने से कोशिकाओं में सिट्इन जीन सक्रिय होते हैं और सुस्त पड़ी कोशिकाओं को सक्रिय कर देते हैं। इससे बॉडी की मरम्मत क्षमता बढ़ती है। इसके लिए जरूरी विटामिन डी का एकमात्र स्रोत सूर्य ही है। इस प्रक्रिया से आप निरोगी रहकर लंबा जीवन जी सकते हैं।

सवाल- क्या इस प्रक्रिया पर कोई रिसर्च हुई है?
जवाब-
हां, हमने खमीर (यीस्ट) और चूहों पर यह प्रयोग किया है। चूहों को दो ग्रुपर में रखा गया। एक ग्रुप के चूहों को बेहद कम और दूसरे को भरपेट भोजन दिया गया। फिर चूहों की कीमोथैरेपी की दवा दी गई। नतीजे चौकाने वाले रहे। भूखे रहने वाले चूहे इस दवाई के प्रभाव को झेल गए और जल्द ही सामान्य हो गए। वहीं भरपेट भोजन करने वाले चूहों में से ज्यादातर सरवाइव नहीं कर पाए।

सवाल- इस जांच से क्या निष्कर्ष निकला?
जवाब-
मान लें आपका शरीर एक हाइटेक कार है। इस कार को कंट्रोल करने वाला सॉफ्टवेयर एपिजिनोम कहलाता है। यह शरीर के हर एक अंग की कोशिकाओं में मौजूद जींस को सक्रिय या निष्क्रिय करता है। ऐसा करने वाले जींस को सिट्इन कहते हैं। जब सिट्इन सुस्त पड़ने लगता है तब बुढ़ापे जैसी खतरनाक बीमारी हावी होने लगती है। भूख, गर्मी और सर्दी शरीर में सिट्इन को रिएक्टिवेट करते हैं। जिसके कारण शरीर की मरम्मत क्षमता बढ़ जाती है। जब तक शरीर में यह प्रक्रिया चलती रहती है, शरीर की उम्र जो भी हो, बुढ़ापा नहीं आता।

सवाल- आप बुढ़ापे को बीमारी कह रहे हैं?
जवाब-
हां, बुढ़ापा बीमारी है और हर आदमी को डराता है। फिर भी इस पर रिसर्च नहीं हो रही है। आप सोचिए 1995 तक औसतन हर व्यक्ति अपनी कुल जिंदगी में 80% सेहतमंद रहता था। ये स्थिति अब घटकर 60% के भी नीचे आ गई है। इसे दुनिया बुढ़ापे से जोड़कर देख रही है। जब हम बुढ़ापे को बीमारी मानेंगे, तभी इस पर शोध कर पाएंगे कि कैसे इंसान अपने जीवन में लंबे वक्त तक निरोगी रह सके।

सवाल- आप बुढ़ापे से दूर रहने के लिए क्या करते हैं?
जवाब-
मैं नाश्ते से परहेज करता हूं। लंबे अंतराल पर भोजन करता हूं। इसमें पानी और सीजनल फल और कच्ची सब्जियों का इस्तेमाल 70% से अधिक करता हूं। रोज शरीर को भूख, गर्मी और सर्दी महसूस करवाता हूं। मेरी उम्र 50 साल हो चली है, पर ऊर्जा 30 साल जैसी है। मेरे 80 साल के पिता भी इसी फॉर्मूले पर चल रहे हैं। वे औसतन 40 साल के लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा फिट हैं।



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फाइल फोटो।
प्रोफेसर डेविड सिंक्लेयर। -फाइल


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Sunday, October 27, 2019

बांस से बना था पहला पटाखा, हजार साल का सफर तय कर चुकी आतिशबाजी की दुनिया के रोचक किस्से

अक्षय बाजपेयी/निसर्ग दीक्षित(डीबी ओरिजिनल डेस्क). दिवाली पर सालों से आतिशबाजी करने और पटाखे जलाने की परंपरा देश में रही है। रावण वध और भगवान राम के अयोध्या लौटने की खुशी में लोग आतिशबाजी करते हैं। पटाखे जलाते हैं। हालांकि पटाखे जलाने का इतिहास भारत में बहुत पुराना नहीं है। इसे नए रिवाज के तौर पर देखा जाता है। खुशियों में पटाखे कहां से शामिल हो गए? दीवाली पर क्यों जलाए जाने लगे? दुनिया में आतिशबाजी कहां से और कैसे आई? ऐसे ही सवालों के जवाब के लिएहमनेइतिहासकारों से बात की। पेश है आतिशबाजी से जुड़ी ये दिलचस्प जानकारी।

हिंदुस्तान के लिए नई है आतिशबाजी की परंपरा : प्रो लोचन

  • पंजाब यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ हिस्ट्री में प्रोफेसर राजीव लोचन ने दैनिक भास्कर APP से खास बातचीत में बताया कि आतिशबाजी में कच्चे माल के रूप में जोचीज इस्तेमाल होती है जिसे शोरा (एक तरह का नमक) कहा जाता है, 18वीं सदी में तो इस नमक का 90 प्रतिशत उत्पादन हिंदुस्तान से होता था। यह यूरोप एक्सपोर्ट किया जाता था, इसलिए ये कहना सही नहीं होगा कि हिंदुस्तान में आतिशबाजी पहले नहीं होती थी।
  • ये जरूर है कि हमें पहले पटाखे जलाने या आतिशबाजी करने का जिक्र नहीं मिलता और करीब से देखें तो 16वीं सदी से बारूद का मिलिट्री इस्तेमाल शुरू हो जाता है, हम ऐसा मानते हैं कि मिलिट्री यूज हो रहा था तो सिविल यूज भी कहीं न कहीं हो ही रहा होगा, हालांकि हिंदुस्तान में आतिशबाजी का इस्तेमाल बहुत बड़े स्तर पर नहीं होता था।
  • अभी खुशियां मनाने में जो पटाखे जलाने या आतिशबाजी करने का रिवाज है, यह बिल्कुल ही नया है। येहमें पहले देखने को नहीं मिलता था। शादी, बारात के पहले जो पिक्चर्स मिलते हैं, उनमें रोशनी के लिए मशालें जरूर मिलती हैं, लेकिन आतिशबाजी कहीं नहीं दिखती। पटाखों का जिक्र भी नहीं मिलता। 18वीं-19वीं सदी से लगातार आतिशबाजी, पटाखों का इस्तेमाल देखने को मिलने लगता है।

प्रो लोचन बोले, हिंदुस्तान के लिए नई है आतिशबाजी की परंपरा।

बाबर नेकिया था बारूद का इस्तेमाल

  • प्रो लोचन कहते हैं कि बारूद औरआतिशबाजी चीनसे ही शुरू हुई। हालांकि इसका जो रॉ मटेरियल है, बहुतायत में हिंदुस्तान में मिलता है। हिंदुस्तान में लोहे को गलाने का हुनर भी काफी पहले से है और चाइना से ज्यादा विकसित रहा है तो ये कहना सही नहीं होगा कि आतिशबाजी चीनसे ही शुरू हुआ। दरअसल कुछ अंग्रेजों ने चीन के विज्ञान का इतिहास लिखा था चूंकि इसी के चलते उन्होंने लिखा कि चीनमें ये सब चीजें हुआ करती थीं।
  • हिंदुस्तान में ऐसी जनरल हिस्ट्री लिखी नहीं गई तो इस कारण इसके बारे में जानकारी थोड़ी कम है। ये जरूर है कि चीन में भी बारूद का इस्तेमाल हथियार के तौर पर नहीं किया गया। हथियार के तौर पर इस्तेमाल तब शुरू होता है, जब बाबर ने भारत पर हमला किया। हालांकि सुरंग में विस्फोट डालकर उसमें ब्लास्ट करने की कहानियां तो हमारे यहां बाबर से भी पुरानी हैं।तुगलकाबाद फोर्ट कोधराशायी करने के लिए तो बारूद का इस्तेमाल हिंदुस्तान में हो रहा था।

कई देशों की आतिशबाजी वर्ल्ड फेमस है।

आतिशबाजी को भव्य बनाने के लिए लाखों-करोड़ों रुपए अब खर्च कर दिए जाते हैं।



समय के साथ बदलते गए पटाखे, बांससे लेकर रिमोट तक का सफर

  • 600-900 एडी के आसपास कुछ चीनी रसायनशास्त्रियों ने चारकोल, सल्फर आदि मिलाकर कच्चा बारूद बनाया। बाद में इसे बांस में भरकर फोड़ा जाने लगा।
  • 10वीं सदी में चीनवासियों ने बांसकी उपयोगिता को समझ कागज के बम बनाने शुरू किए, जिसका उपयोग वे दुश्मनों को डराने के लिए करते थे।
  • कागज के पटाखे इजाद करने के 200 साल बाद चीन में हवा में फूटने वाले पटाखों का निर्माण शुरू हो गया। इन पटाखों का उपयोग युद्ध के अलावा एयर शोज के लिए होने लगा।
  • 13वीं सदी में यूरोप और अरब देशों में बारूद के विकास का काम शुरू हुआ। यहां वैज्ञानिक और सेना ने बारूद के इस्तेमाल से शक्तिशाली हथियार बनाना प्रारंभ कर दिया।

दिवाली पर बाजार में आए हैं इस बार कुछ हटकर पटाखे।

  • मध्यकालीन इंग्लैण्ड में बारूद के हल्के स्वरूप के प्रयोग से जश्न मनाने का सिलसिला शुरू हुआ। इस दौरान जीत की खुशी और समारोह के मौके पर फायर शो के आयोजन होने लगे।
  • 1830 में प्रथम बार इटली में अलग तरह की धातुओं को मिलाकर रंग बिरंगी आतिशबाजी बनाई गई। हालांकि पायरोटेक्निक की शुरूआत 13वीं सदी में हो चुकी थी।इसकी शिक्षा के लिए पूरे यूरोप में ट्रेनिंग स्कूल खोले गए।
  • फिलहाल दुनियाभर में पटाखों की कई आधुनिक किस्में मौजूद हैं। इनका उपयोग फायर शो और जश्न के लिए किया जाता है। तेज आवाज से लेकर बेहतरीन आकार में रंग बिखेरने वाले इलेक्ट्रॉनिक पटाखे बाजार में दस्तक दे चुके हैं।

क्या है आतिशबाजी का इतिहास

  • दरअसल बारूद औरआतिशबाजी के इतिहास को लेकर अलग-अलग इतिहासकारों ने अलग-अलग दावे किए हैं। इनके अविष्कार का कोई एक लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कई इतिहासकर यह मानते हैं कि बारूद दूसरी सदी में प्राचीन चीन के लियुयांग में बनाया गया। 'बांस' को पहला पटाखा माना गया। बांस को जब आग में फेंका जाता था तो अपनी विशेष बनावट के चलते अत्यधिक गर्मी होने पर यह आवाज के साथ फटते थे। प्राचीन चीन के लोग ऐसा मानते थे कि इस आवाज से बुरी आत्माएं दूरी भागती हैं और सुख-शांति करीब आती है। इसलिए वे बांस को आग में फेंकना शुभ मानते थे। कुछ इतिहासकार बारूद पटाखों के आविष्कार का श्रेय मध्य पूर्व को भी देते हैं।

किंवदंती है कि एक दुर्घटनासे ईजाद हुआ बारुद

  • किंवंदती है कि चीन में करीब हजार साल पहले बारूद का अविष्कार हुआ। इसे लेकर एक कहानी भी प्रचलित है। ऐसा कहा जाता है कि चीन में बारूद का अविष्कार एक दुर्घटना के चलते हुआ था। एक चीनी रसोइए ने खाना बनाते समय गलती से साल्टपीटर (पोटेशियम नाईट्रेट) आग पर डाल दिया। इससे उठने वाली लपटें रंगीन हो गईं। इन रंगीन लपटों को देखकर लोगों की उत्सुकता बढ़ी। फिर रसोइए ने साल्टपीटर के साथ कोयले और सल्फर का मिश्रण इसमें डाल दिया, जिससे रंगीन लपटों के साथ ही काफी तेजी आवाज भी हुई। बस यहीं से बारूद की खोज हो गई। एक अन्य दावे के अनुसार, सॉन्ग वंश (960- 1276) के दौरानबारूद का आविष्कार हुआ था।
दुनिया के पटाखा बाजार में आज भी चीन का दबदबा कायम है।
  • बारूद के अविष्कार को लेकर एक दावा यह भी है कि, हजार साल पहले एक संन्यासी ली तियान ने इसकी खोज की थी। वह चीन के हुनान प्रांत के लियुयांग शहर का रहने वाला था। यह क्षेत्र आज भी आतिशबाजी के उत्पादन में दुनियाभर में सबसे आगे माना जाता है। सोंग वंश के दौरान ली तियांग की पूजा के लिए एक मंदिर का निर्माण करवाया गया था। चीन के लोग आज भी हर साल 18 अप्रैल को आतिशबाजी के अविष्कार का जश्न मनाते हैं और ली तियांग को याद करते हैं। चीन में ऐसी मान्यता है कि आतिशबाजी, पटाखों से बुरी आत्माएं भागती हैं। इसलिए जन्मदिन, विवाह, नववर्ष जैसे खुशी के मौकों पर आतिशबाजी की परंपरा वहां से शुरू हुई और फिर दुनियाभर में फैलती गई।

भारत में 8वीं शताब्दी में बारूद होने के प्रमाण

  • इतिहासकारों का मानना है कि, भारत में बारूद का ज्ञान 8वीं शताब्दी से मौजूद है। 8वीं शताब्दी में संकलित संस्कृत भाषा के गृंथ वैशम्पायन के नीति प्रकाशिका में एक समान पदार्थ का उल्लेख मिलता है। हालांकि आतिशबाजी में इस्तेमाल होने के लिए बारूद की क्षमता उस वक्त महसूस नहीं की गई थी। इतिहासकार कौशिक रॉय का यह मानना है कि प्राचीन भारत साल्टपीटर को अग्निचूर्ण या आग पैदा करने वाले पाउडर के रूप में जानता था। 13वीं शताब्दी में चीन में मिंग राजवंश की सैन्य गतिविधियों ने दक्षिण पूर्व एशिया, पूर्वी भारत और अरब दुनिया से बारूद का परिचय करवाया। शुरुआत में बारूद का उपयोग सैन्य गतिविधियों में ही किया गया। आतिशबाजी के तौर पर भी इसका इस्तेमाल करना चीन ने ही दुनिया को सिखाया।

15वीं शताब्दी की पेंटिंग्स से मिलते हैं प्रमाण

  • 15वीं शताब्दी में मुगलों की पेंटिंग्स में बड़े पैमाने पर इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि भारत में उस दौरान उत्सवों में आतिशबाजी की शुरुआत हो चुकी थी। वर्ष 1633 में मुगल बादशाह शाहजहां के बेटे दारा शिकोज के बेटे के विवाह से जुड़ी एक पेंटिंग में भी आतिशबाजी होने के प्रमाण मिलते हैं। 1953 में इतिहासकार पीके गोड़े ने 'द हिस्ट्री ऑफ फायरवर्क्स इन इंडिया बिटवीन 1400 एंड 1900 एडी' लिखा था। वे 1518 में गुजरात में एक ब्राह्मण दंपत्ति की शादी में आतिशबाजी होने का प्रमाण भी देते हैं।
15वीं शताब्दी की पेंटिंग्स से मिलते हैं प्रमाण।
  • मध्यकालीन भारत पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में इतिहासकार सतीश चंद्रा ने लिखा है कि 17वीं शताब्दी में बीजापुर के शासक रहे आदिल शाह के विवाह में 80 हजार रुपए आतिशबाजी पर खर्च किए गए। अंग्रेजों के शासन के दौरान उत्सवों में आतिशबाजी करना भारत में काफी लोकप्रिय हुआ। 19वीं शताब्दी में पटाखों की मांग बढ़ने का ही नतीजा था कि कई फैक्ट्रीज स्थापित हुईं। भारत में पटाखों की पहली फैक्ट्री 19वीं शताब्दी में कोलकाता में स्थापित हुई। बाद में यह तमिलनाडु के शिवकाशी में स्थापित हो गई।

दो भाइयों ने शिवकाशी में शुरू की थी फैक्ट्री, आज यहां सबसे बड़ा बाजार

दो भाईयों ने शिवकाशी में शुरू की थी फैक्ट्री।

  • दासगुप्ता नाम के व्यक्ति 1892 से कोलकाता में एक मैच फैक्ट्री चला रहे थे। भुखमरी और सूखे की समस्या से जूझ रहे शिवकाशी के दो भाई शणमुगा और पी नायर नाडर दासगुप्ता की फैक्ट्री में नौकरी के लिए पहुंचे। मैच फैक्ट्री के कामकाज को समझने और सीखने के बाद इन्होंने शिवकाशी में अपनी खुद का उद्योग शुरू किया।

पी नय्यर नाडर का एक चित्र।

  • शिवकाशी का शुष्क मौसम इनके लिए फायदेमंद साबित हुआ। इस तरह शिवकाशी में पहली पटाखा फैक्ट्री शुरू हुई। आज तमिलनाडु का शिवकाशी भारत में पटाखों का सबसे बड़ा बाजार है। देश के 85% पटाखे सिर्फ शिवकाशी में ही बनते हैं। हालांकि विश्व मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण शिवकाशी का पटाखा बाजार विश्व बाजार में अपने पैर नहीं फैला सका।

यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से बनते हैं पटाखे

  • असम के गानाकच्ची गांव में 130 सालों से ऐसे पटाखे बनाए जा रहे हैं, जो सामान्य पटाखों की तुलना में कम धुआं छोड़ते हैं। यहां पर स्थित बारपेटा फैक्ट्री का काम संभाल रहे गोपजीत पाठक ने बताया, ‘‘बाजार में जो पटाखे बिकते हैं, उनमें बेरियम नाइट्रेट और एल्युमीनियम पाउडर का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, जिस कारण इनसे ज्यादा धुआं निकलता है और यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन पर बैन लगाने की बात कही है। वहीं हमारे यहां 130 साल पुराने चीनी तरीके से जो पटाखे बनते हैं, उनमें ज्यादा केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इसी वजह से पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम धुआं निकलता है।’’

असम के इस गांव में चीनी तरीके से बनाए जाते हैं पटाखे।

तोहफे में मिली किताब से मिला था पटाखे बनाने का चीनी सूत्र


पुस्तक से इस पटाखा कंपनी की कहानी शुरू हुई। मेरे दादा का लक्ष्मी नुबी नाम का दोस्त था। लक्ष्मी बांग्लादेश गए थे, बिजनेस के सिलसिले में। वहां से उन्होंने एक पुस्तक खरीदी और मेरे दादाजी को गिफ्ट की। उसमें चीन के पटाखों का फॉर्मूला था। जिसे पढ़कर बांग्लादेश से सामान मंगाया और पटाखा बनाने की फैक्ट्री शुरू की। असम के बरकटा जिले में एक मंदिर था 'नामघर', वहां पर होली का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाते हैं। ये सन 1885 के पहले की बात है, उस समय मेरे दादाजी ने लोगों को पटाखे जलाकर दिखाए। इसके बाद ही लोगों ने पटाखे खरीदना शुरू किया और तभी से हमारा कारोबार शुरू हुआ। मेरे दादाजी के गुजरने के बाद पिता ने और फिर मैंने इसका काम संभाला। अभी इस फैक्ट्री को चौथी पीढ़ी संभाल रही है।

2018सेग्रीन पटाखों से दिवाली

  • 2018 से दिवाली पर ग्रीन पटाखों की कई वैरायटी नजर आ रही हैं। प्रदूषण घटाने, हानिकारक केमिकल और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। एससी ने पिछले साल ही पारंपरिक पटाखों पर प्रदूषण के चलते बैन लगा दिया था। इसके बाद शिवकाशी ने खुद को ग्रीन पटाखों के लिए तैयार कर लिया है। तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमॉर्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (TNFAMA) के प्रेसिडेंट पी गणेशन ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में बताया कि केंद्र और तमिलनाडु सरकार ने ग्रीन पटाखे के लिए ट्रेनिंग देने में हमारी मदद की। इससे 30 प्रतिशत तक प्रदूषण कम होगा।
  • हालांकि शिवकाशी में98% पटाखे पुराने फॉर्मूले से ही बनाए जा रहे हैं। दरअसल, यहां सिर्फ चार कंपनियों को ही इसका लाइसेंस दिया गया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका ग्रीन विकल्प पोटेशियम पेरियोडेट 400 गुना महंगा है, जिसके चलते निर्माताओं ने कम ग्रीन पटाखे बनाए।
  • शिवकाशी में फिलहाल हर तरफ पटाखे ही दिख रहे हैं। दिवाली के चलते पटाखे सप्लाई करने का काम जोरों पर है। शिवकाशी में रजिस्टर्ड पटाखा निर्माताओं की संख्या 1070 हैं और छोटे-बड़े मिलाकर 1800 से लेकर 2000 इकाइयां पटाखे बनाती हैं। बीते वर्ष यहां पटाखों के व्यापार का टर्नओवर 6500 करोड़ रुपए रहा। सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बाद यह लगातार गिर रहा है। बीते पांच सालों में टर्नओवर 60 फीसदी कम हुआ है।


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Diwali Firecrackers 2019: History, Facts About The History Of Firecracker In India - Diwali (Deepaavali festival)


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कांचीपुरम् की सुंदरा महालक्ष्मी के दाएं पैर में 6 अंगुलियां, दुनिया की सबसे दुर्लभ प्रतिमाओं में से एक

कांचीपुरम. मंदिरों का शहर कहे जाने वाले तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले से 15 किमी दूर अरासर कोइल में दुनिया की सबसे दुर्लभ लक्ष्मी प्रतिमा है। सुंदरा महालक्ष्मी के नाम से स्थापित इस मंदिर का इतिहास रामायण काल के समकक्ष है, क्योंकि इस मंदिर की स्थापना करने वालों में राजा जनक का भी नाम है। इस मंदिर में स्थापित माता लक्ष्मी की प्रतिमा दुनिया में एकमात्र ही मानी गई है, इसकी विशेषता है मूर्ति के सीधे पैर में पांच की बजाय 6 अंगुलियां होना, अंक ज्योतिष में 6 शुक्र का अंक माना गया है, शुक्र सभी तरह के ऐश्वर्य देने वाला ग्रह माना जाता है, इसलिए सुंदरा महालक्ष्मी को शुक्र की नियंत्रक देवी माना गया है।

सुंदरा महालक्ष्मी को 64 तरह की लक्ष्मियों में श्रेष्ठ माना जाता है। इन्हें 64 ऐश्वर्य देने वाला कहा गया है। कांचीपुरम जिले में मौजूद प्रमुख मंदिरों में इसे शुमार किया जाता है। इस मंदिर का 6 बार रिनोवेशन किया जा चुका है। मंदिर के मुख्य पुजारी पं. कन्नम भट्टाचार्य के मुताबिक मंदिर करीब 6500 साल पुराना है। आखिरी बार मंदिर का जीर्णोद्धार 2016 में किया गया था। दीपावली पर चतुर्दशी से लेकर तीज तक 5 दिन उत्सव मनाया जाता है। जिसमें देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर की भी पूजा होती है। तालपुराण के मुताबिक कुबेर इस जगह स्वयं लक्ष्मी का पूजन करते हैं। इस मंदिर के साथ ही भगवान विष्णु का भी एक मंदिर है, जिसे कमल वरदराज के मान से जाना जाता है। ये मंदिर भगवान विष्णु के 108 दिव्यदेशम् में गिना जाता है।

  • ब्रह्मा और विष्णु से जुड़ी है इस मंदिर की कहानी

दक्षिण भारतीय तालपुराण के मुताबिक ब्रह्मा धरती पर ब्रह्म भूमि की खोज करने आए थे। तब कांचीपुरम के पास समुद्र किनारे उन्हें भगवान विष्णु और राजा जनक दिखाई दिए। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा को दूध मिली मिट्टी देकर उससे यज्ञकुंड स्थापित करने की सलाह दी। ब्रह्मा ने कांची के पास इससे यज्ञकुंड स्थापित किया। भगवान विष्णु और जनक ने यहां धन और धान्य की पूर्ति के लिए महालक्ष्मी की पूजा की। तभी से महालक्ष्मी यहां सुंदरा महालक्ष्मी के रुप में स्थापित हैं। शुक्र पर लक्ष्मी के नियंत्रण के कारण उनके सीधे पैर के पंजे में 6 अंगुलियां है। इस मंदिर और प्रतिमा का शिल्पकार देवशिल्पी विश्वकर्मा को माना जाता है।

  • कमल के फूल पर विराजित हैं महालक्ष्मी

इस मंदिर में काले पत्थर से बनी महालक्ष्मी की प्रतिमा काफी सुंदर है। ये कमल के फूल पर पद्मासन अवस्था में बैठी हैं। दो हाथों में कमल के फूल हैं और एक हाथ वरदान मुद्रा में, दूसरा अभय मुद्रा में है। मूर्ति के गले में तुलसी की माला और हाथों में गहने और मस्तक पर सूर्य व चंद्रमा विराजित हैं।

  • शुक्रवार को शुक्र के होरा में दर्शन का महत्व

इस मंदिर में शुक्रवार को विशेष अनुष्ठान होते हैं, इसमें लक्ष्मी और कुबेर के साथ शुक्र की भी पूजा होती है। ज्योतिषीय गणना करके अगर शुक्रवार को शुक्र के ही होरा में यानी ब्रह्म मुहूर्त में इस मंदिर में दर्शन किए जाएं तो सभी 64 तरह के ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है।

  • विजयनगर साम्राज्य का अभिन्न अंग

दक्षिण भारत के सबसे बड़े राज्य विजय नगर के लिए ये मंदिर हमेशा से बहुत खास रहा है। यहां विजयनगर के चौल और अन्य राजाओं ने काफी अनुष्ठान किए हैं। इतिहास में इसे विजयनगर साम्राज्य के मुख्य मंदिरों में गिना गया है। यहां मौजूद शिलालेखों में विजयनगर सम्राटों का उल्लेख है।

DBApp



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Diwali 2019 Sundara Mahalakshmi temple in Kanchipuram Chennai most amazing temple of Lakshmi


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300 ईसा पूर्व कौमुदी महोत्सव पर दीपदान होता था, 2000 साल बाद यह आज जैसे स्वरूप में पहुंचा

नई दिल्ली. भगवान राम के अयोध्या लौटने से लेकर भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध करने और भगवान विष्णु द्वारा देवी लक्ष्मी को बलि की कैद से मुक्त कराने जैसी कई धार्मिक मान्यताएं दिवाली की शुरुआत का कारण मानी जाती हैं। कई सामाजिक मान्यताएं भी हैं, जो इसे एक कृषक समुदाय के त्योहार के रूप में स्थापित करती हैं। इन सभी मान्यताओं के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में इस उत्सव को मनाए जाने का उल्लेख पिछले 2500 सालों की कई रचनाओं में आया है। अलग-अलग ग्रंथों, पुराणों, उपन्यासों, विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तान्तों और धार्मिक स्कॉलरों की रचनाओं में दिवाली उत्सव का जिक्र है। दैनिक भास्कर APP ने पूना के भंडारकर शोध संस्थान के अध्यक्ष रहे डॉ. पीके गोडे की किताब ‘स्टडीज इन इंडियन कल्चर स्टडीज’, कलानाथ शास्त्री की किताब ‘भारतीय संस्कृति : आधार और परिवेश’ और एसी मुखर्जी की किताब ‘हिंदू फास्ट एंड फिस्ट’ में 1500 ईसवी से पहले की रचनाओं के हवाले से दिए गए संदर्भों के आधार पर प्राचीन काल में इस उत्सव को मनाए जाने के तरीकों को जाना।


दिवाली का आज जो स्वरूप है, वह पिछले 2 से 3 हजार सालों की कई परम्पराओं के एक साथ समन्वित हो जाने से 500 साल पहले हुआ। ईसा पूर्व में जहां इस उत्सव पर केवल दीपक जलाकर उजाला करने की परंपरा का उल्लेख मिलता है, तो 500 ईस्वी तक इसमें नाच-गाने समेत कई सामाजिक गतिविधियां जुड़ गईं थी। घरों की सजावट, दोस्तों-रिश्तेदारों को उपहार भेंट करना, नए कपड़े पहनने जैसी परंपराएं भी 1000 ईसवी तक इस उत्सव में शामिल हो गईं। 1000 ईसवी के बाद इस उत्सव में लक्ष्मी पूजा व 14वीं सदी में पटाखे जलाने का उल्लेख प्राचीन रचनाओं में मिलता है।


1000 से 600 ईसा पूर्व : ऊंचे बांस पर दीपक जलाए जाते थे
दीपक जलाने का सबसे पुराना उल्लेख उत्तर वैदिक काल (1000-600 ईसा पूर्व) में मिलता है। शरदकाल (वर्तमान में दिवाली का समय) में दीपक को किसी ऊंचे बांस पर टांग दिया जाता था। शास्त्रों में यह विधान बहुत पुराना है। इसके अनुसार श्राद्ध पक्ष के बाद जब पूर्वज अपने लोकों की ओर लौटते हैं तो उन्हें मार्ग दिखाने के लिए दीपकों को बहुत ऊंचाई पर टांगा जाता था। इन्हें आकाशदीप कहा जाता था।


400 से 200 ईसा पूर्व : कौमुदी महोत्सव में दीपदान का उल्लेख
चाणक्य और चंद्रगुप्त के समय पाटलिपुत्र में कौमुदी महोत्सव मनाया जाता था। विद्वानों के अनुसार, यह उत्सव शरद पूर्णिमा को मनाया जाता था। जो कार्तिक अमावस्या (दीपावली) से 15 दिन पहले होती है। इस महोत्सव में जलाशयों पर और नावों में दीपक जलाए जाते थे। 2000 साल पहले लिखे गए ‘सप्तशती’ में भी महिलाओं द्वारा स्थान-स्थान पर दीपक रखकर उत्सव मनाने का वर्णन है।


100 से 500 ईसवी: कार्तिक अमावस्या के दिन नाच-गाने और जुआ खेलने का उल्लेख
50 से 400 ईस्वी के बीच कार्तिक अमावस्या को यक्षरात्रि के नाम से एक सामाजिक उत्सव मनाने की परंपरा थी। इसका उल्लेख सबसे पहले वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ में मिलता है। इस उत्सव में नाच-गाने के साथ-साथ कुछ सामाजिक गतिविधियां होती थीं। स्कॉलर टीएन रे ने भी अपने एक रिसर्च आर्टिकल ‘द इंडोर एंड आउटडोर गेम्स ऑफ इंडिया’ में यक्षरात्रि पर्व के बारे में बताया है। इनके मुताबिक, आज जिस दिन दिवाली मनाई जाती है, ठीक उसी दिन 500 ईस्वी के आसपास यक्षरात्रिमनाई जाती थी। इसमें सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ लोग जुआ भी खलते थे।


600-1000 ईसवी: घरों की सजावट और कपड़े भेंट करने की परंपरा का जिक्र

  • 606 से 648 ईस्वी के बीच लिखे गए नागानंद नाटक में दीप प्रतिपदोत्सव का उल्लेख है। इस उत्सव में नवविवाहितों को उनकी पहली दिवाली पर कपड़े भेंट करने की परंपरा का जिक्र है। यह नाटक कन्नौज के राजा हर्षवर्धनने लिखा था।
  • 500 से 800 ईसवीके बीच लिखे गए नीलमत पुराण में यक्षरात्रि की ही तरह ही सुखसुप्तिका का उल्लेख है। इस दिन हर जगह दीपों के जरिए उजाला करने, परिवार और रिश्तेदारों के साथ भोजन करने, नाचने, गाने और जुआ खेलने, नए कपड़े और गहने पहनने, दोस्तों, रिश्तेदारों को नए कपड़े भेंट करने की परंपरा थी। इसी दौर में लिखे गए आदित्य पुराण में भी सुखसुप्तिका का उल्लेख है।
  • 959 ईस्वी के आसपास मालखेड़ के राष्ट्रकूट राजा कृष्ण-तृतीय के समय सोमदेवसूरि द्वारा लिखे गए ‘यशस्तिलक चंपू’ में दीपोत्सव से पहले घरों की लिपाई-पुताई और सजावट करने का उल्लेख है। घरों की सबसे ऊंचाई वाले स्थानों पर उजाला करने के साथ-साथ इस दिन नाच-गाने और जुआ खेलने का वर्णन है। इस दिन शादियां होने का भी उल्लेख है।


1000-1200 ईसवी: पहली बार विदेशी यात्रियों ने दिवाली का जिक्र किया

  • 1030 ईस्वी में अरब यात्री अलबरूनी ने ‘तहकीक-अल-हिंद’ में दिवाली शब्द का जिक्र करते हुए लिखा है, ‘इस दिन भारत में लोग नए कपड़े पहनते हैं, पान के पत्ते और सुपारी के साथ उपहार देते हैं, मंदिरों के दर्शन करते हैं, गरीबों को दान देते हैं और घर के हर कोने में रोशनी करते हैं।’ अलबरूनी ने इस दिन को वासुदेव की पत्नी लक्ष्मी और बाली की मुक्ति का दिन भी बताया है। उन्होंने इस दिन शादियों का भी जिक्र किया है।
  • 1100-1200 ईसवीमें मुल्तान के अब्दुल रहमान ने ‘संदेश रासक’ में महिलाओं द्वारा घरों में दीपक जलाने और इनसे निकले काजल को आंखों में लगाने का जिक्र किया है।
  • 1100 ईस्वी में ही आचार्य हेमचंद्र ने अपनी किताब ‘देशी नाममाला’ में प्राचीन भारत में मनाए जाने वाले जक्खरत्ती पर्व का उल्लेख किया है, जो यक्षरात्रि की तरह ही प्रतीत होता है।
  • 1119 ईस्वी में चालुक्य वंश के समय के कन्नड़ शिलालेख में इस दिन एक राजा के द्वारा नीलेश्वर देव को उपहार भेंट करने का वर्णन है।


1200-1400 ईसवी: यमद्वितीया के दिन बहन के घर भाई के भोजन करने का उल्लेख

  • 1220 ईसवीमें महाराष्ट्र के संत ज्ञानेश्वर ने अपनी तीन अलग-अलग रचनाओं में दीपावली का उल्लेख किया है। उन्होंने इस दिन दीपकों के जरिए हुए उजाले की तुलना आत्मीय ज्ञान से की है।
  • 1250 ईस्वी में महानुभाव पंत की मराठी रचना ‘लीलाचरित्र’ में गणेश जी को आराध्य देव मानने वाले गोसावी समुदाय के लोगों के स्नान का जिक्र है। इसके लिए बड़ी मात्रा में पानी इकट्ठा किया जाता था। नहाने से पहले तेल मालिश की जाती थी। किताब में कार्तिक अमावस्या के दो दिन बाद यम द्वितीया (भाई दूज) का भी जिक्र है। इसमें लिखा गया है कि यम द्वितीया के दिन खाने के लिए मिठाईंयां और लड्डू की व्यवस्था की जाती थी। बहनें अपने भाई की आरती उतारकर उन्हें मिठाईंया खिलाती थीं।
  • 1260 ईस्वी में प्रशासक और कवि रहे हिमाद्री पंत ने अपने व्रतखण्ड ‘चतुर्वर्ग चिन्तामणि’ में यम और उनकी बहन यमुना के एक किस्से का उल्लेख किया है। ‘भविष्योत्तर पुराण’ से लिए कुछ पंक्तियों के जरिए उन्होंने बताया कि यमद्वितीया के दिन यम ने यमुना के घर भोजन किया था। हो सकता है तभी से यह दिन भाई-बहन के त्योहार भाईदूज के रूप में मनाया जाने लगा हो।
  • 1305 ईस्वी में गुजरात के जैन स्कॉलर मेरुतुंग ने अपनी रचना ‘प्रबंध चिंतामणि’ में दिवाली की रात कोल्हापुर के राजा की पत्नियों द्वारा महालक्ष्मी की पूजा का उल्लेख किया है। इसी काल में गुजरात के राजा रहे सिद्दाराजा द्वारा लक्ष्मी जी को सोने के गहनें, जादुई कपड़ें और कपूर चढ़ावाने का उल्लेख भी मिलता है।


1400-1500 ईसवी: पहली बार पटाखों का जिक्र

  • विजयनगर साम्राज्य (दक्षिण भारत) के सामाजिक, धार्मिक और राजनैतिक सिद्धांतों को बताते ग्रंथ ‘आकाशभैरवकल्प’ में एक राजा द्वारा नरकचतुर्दशी और कार्तिकशुक्ल प्रतिपदा को दिवाली कैसे मनानी चाहिए वह लिखा है। इसके अनुसार, यह त्योहार राजा को खुशियां, विजय और संतान देने वाला होता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर नहाना, ब्राह्मणों की पूजा करना चाहिए। राजा की पत्नियों को तेल मालिश के बाद गर्म पानी से स्नान करना चाहिए। राजा को तीन दीपक जलाकर अपने आराध्य देव की पूजा करना चाहिए। इसके बाद अपने राज सिंहासन पर बैठकर अपने दरबार में उपस्थित कवि, ब्राह्मण, कलाकारों और ज्योतिष वैज्ञानिकों को कपड़ों के रूप में तोहफे भेंट करने चाहिए। राजा को इसके बाद अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ भोजन करना चाहिए। नाटकों के मंचन के बाद बाणविद्या (आतिशबाजी) देखना चाहिए।’
  • 1420 ईस्वी में इटली के यात्री निकोलोई कोंटी ने विजयनगर साम्राज्य की यात्रा की थी। उन्होंने अपने यात्रा वृतान्त में दिवाली के बारे में लिखा है कि इस दिन घरों की छतों पर दिन-रात दिए जलाए जाते थे।


1500 ईसवीके बाद : मुगलकाल की पेंटिग्स में दीपावली का जश्न
1500 ईसवीके बाद दिवाली को आज के स्वरूप की तरह ही मनाया जाने लगा था। मुगल शासक अकबर के समय इसे जश्न-ए-चिरागा के नाम से मनाया जाता था। मुगल काल की कई पेंटिग्स में दीपावली का जश्न दर्शाया गया है। 17वीं सदी में कई मशहूर विदेशी यात्रियों और स्कॉलरों ने भी अपनी किताबों में भारत में दिवाली मनाए जाने का उल्लेख किया। सन 1613 में पुर्तगाली लेखक गोडिन्हो डी ऐरेडिया, 1623 में पी डेला वेले, 1651 में ए रोगेरियस, 1671 में आयरिश व्यापारी विलियम हेजेस ने अपने लेखों में दिवाली का जिक्र किया। 15 वीं सदी के बाद के सभी धर्म ग्रंथों में दिवाली का वर्णन ठीक उसी प्रकार का मिलता है, जैसे आज मनाया जाता है। यानी दीपोत्सव, लक्ष्मी पूजा, लिपाई पुताई सभी का विधान मिलता है।


प्राचीन पुराणों में अमावस्या को लक्ष्मी पूजा निषेध थी
प्राचीन पुराणों में लक्ष्मी पूजन के व्रत पोष, चैत्र और भाद्रपद में बताए गए हैं। स्कंद पुराण में लिखा है कि लक्ष्मी का पूजन पूर्णिमा को करना चाहिए। कृष्ण पक्ष और रात्रि में पूजा की मनाही थी। यानी पहले लक्ष्मी की पूजा अमावस्या को नहीं की जाती थी। लेकिन बाद की पुराणों (500 ईस्वी के बाद लिखी गई नीलमत पुराण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण आदि) में कार्तिक की अमावस्या को लक्ष्मी पूजन का विधान कर दिया गया था। भविष्य पुराण में यह उत्सव व्यापारियों के उत्सव के रूप में बताया गया है और बाजारों में रोशनी करने, शाम को लक्ष्मी पूजा करने और खुशियां मनाने का विधान किया गया है। भविष्य पुराण में तीन प्रकार की स्वच्छता पर जोर दिया गया है। नरक चतुर्दशी के दिन स्नान का विधान है। घरों, सार्वजनिक स्थानों और देवालयों की सफाई और लिपाई-पुताई का विधान है। इन जगहों पर व खासकर वाणिज्यिक केन्द्रों पर दीपकों के माध्यम से उजाला करने को एक धार्मिक कर्तव्य बताया गया है।

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diwali 2019 special story history of diwali


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Friday, October 25, 2019

भारतीयों के पास 70 लाख करोड़ का सोना, ये देश के 2 साल के बजट से भी ज्यादा

नई दिल्ली. धनतेरस और दिवाली का त्योहार आते ही देश में सोने की मांग बढ़ जाती है। भले ही इस बार कीमतें ज्यादा होने के कारण मांग कम रहने की संभावनाहै। लेकिन, देश में सोने की जितनी सालाना मांग रहती है, वह वैश्विक मांग की एक चौथाई है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के प्रबंध निदेशकसोमसुंदरम पीआर ने दैनिक भास्कर APP को बताया कि भारतीय घरों और मंदिरों में 24000 से 25000 टन सोना मौजूद है, जिसकी कीमत 1 ट्रिलियन डॉलर (करीब 70 लाख करोड़ रुपए) है। उनके मुताबिक, दुनियाभर में मौजूद कुल गोल्ड स्टॉक का 15% सिर्फ भारतीय घरों और मंदिरों में है। अमेरिकी के केंद्रीय बैंक में 8,133.5 टन सोना है, जो भारतीयों के पास मौजूद सोने से करीब 3 गुना कम है।


9 साल में दुनिया का गोल्ड स्टॉक 15% बढ़ा

साल गोल्ड स्टॉक
2010 1,68,343.5 टन
2011 1,71,187.3 टन
2012 1,74,104.0 टन
2013 1,77,175.7 टन
2014 1,80,313.8 टन
2015 1,83,521.3 टन
2016 1,86,806.5 टन
2017 1,90,125.5 टन
2018 1,93, 472.4 टन


देश में सोने का उत्पादन 0.5% से भी कम, लेकिन मांग 25% से भी ज्यादा

  • चीन के बाद भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा बाजार है। हालांकि, हमारे यहां सोने का उत्पादन 0.5% से भी कम होता है। लेकिन, डिमांड कुल वैश्विक मांग की 25% से भी ज्यादा है। सोमसुंदरम के मुताबिक पिछले 10 साल का ट्रेंड बताता है कि भारत में सालाना 800 से 900 टन सोने की मांग रहती है।
  • सोमसुंदरम कहते हैं कि आने वाले 5 से 10 साल में भारत में सोने की मांग और बढ़ेगी। क्योंकि, अब भारत की जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय तेजी से बढ़ रही है। इससे ज्यादा से ज्यादा लोगों को गरीबी से बाहर आने में मदद मिल रही है। इस वजह से आने वाले समय में भारत में ज्यादातर लोग गरीबी रेखा से उठकर मध्यम वर्ग में आ जाएंगे और यही लोग भविष्य में सोने की मांग बढ़ाएंगे।


गोल्ड डिमांड ट्रेंड्स

साल ग्लोबल भारत
2019 (जून तक) 817.5 टन 372.1 टन
2018 4,345.1 टन 760.4 टन
2017 4,159.9 टन 771.2 टन
2016 4,308.7 टन 666.2 टन
2015 4,215.8 टन 858.1 टन
2014 3,923.7 टन 834.4 टन
2013 4,087.6 टन 958.1 टन
2012 4,405.5 टन 914.5 टन
2011 4,067.1 टन 974.0 टन
2010 3,812.2 टन 1001.7 टन
2009 3,385.8 टन 642.4 टन


घरों-मंदिरों में जितना सोना, वह 2 साल के बजट के बराबर
भारतीय घरों और मंदिरों में जितनी कीमत का सोना मौजूद है, वह देश के 2 साल के बजट से भी ज्यादा है। 2019-10 का बजट का 27,86,349 करोड़ रुपए है। इसके अलावा, टॉप-100 अमीर भारतीयों के पास भी 32.19 लाख करोड़ रुपए है, जबकि भारतीयों के पास ही 70 लाख करोड़ रुपए का सोना है।


भारत में सोने की इतनी मांग क्यों?

  • एक जमाने में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, क्योंकि यहां सबसे ज्यादा सोना हुआ करता था। आज भी कई देशों की जीडीपी के बराबर सोना भारतीय घरों और मंदिरों में रखा हुआ है। लेकिन, हमारे देश में सोने की इतनी ज्यादा मांग का कारण क्या है? इस बारे में सोमसुंदरम बताते हैं कि सोना ही एकमात्र ऐसी संपत्ति है, जो आमतौर पर घर की महिला के पास ही रहती है और इससे महिलाओं को वित्तीय स्वतंत्रता मिलती है।
  • भारत में ऐतिहासिक रूप से सोने की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। देश में सोने की ज्यादा मांग होने के यह कारण भी हैं कि सोने को सुरक्षित घरेलू बचत के तौर पर रखा जाता है, जिससे महंगाई से निपटने में मदद मिलती है।
  • जरूरत पड़ने पर सोने के बदले लोन भी लिया जा सकता है। सोना रखकर कृषि या गैर-कृषि ऋण आसानी से मिल जाता है। इन सबके अलावा घर में सोना रखने से सामाजिक परंपरा और सांस्कृतिक संबंध भी बना रहता है।


टॉप-10 देश जहां के केंद्रीय बैंक में सबसे ज्यादा सोना है

अमेरिका 8,133.5 टन
जर्मनी 3,366.8 टन
आईएमएफ 2,814.0 टन
इटली 2,451.8 टन
फ्रांस 2,436.1 टन
रूस 2,207.0 टन
चीन 1,926.5 टन
स्विट्जरलैंड 1,040.0 टन
जापान 765.2 टन
भारत 618.2 टन
नीदरलैंड्स 612.5 टन

(आंकड़े जून 2019 तक, सोर्स - वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल)


भारत में सोने की मांग बढ़ने के कारण
1) शादी : भारत में सोने की 50% से ज्यादा मांग शादियों पर निर्भर करती है। देश में 25 साल से कम उम्र की 45% से ज्यादा आबादी रहती है और सालाना औसतन 1 करोड़ शादियां होती हैं। अगर औसत निकालें तो एक दुल्हन के लिए 200 ग्राम तक की ज्वेलरी खरीदी जाती है।
2) सेविंग्स रेट (बचत दर) : आईएमएफ को भारत में 2020 तक बचत दर 30% रहने की उम्मीद है। इसके बाद काम करने वालों की संख्या बढ़ने की संभावना भी है। संपत्ति के तौर पर भारतीयों के बीच बैंक डिपॉजिट के बाद सोना दूसरी पसंद है।
3) आर्थिक विकास : भारत में 25 करोड़ से ज्यादा लोग बचत करते हैं और उनकी बचत सोने से शुरू होती है। इसलिए आर्थिक विकास और लोगों की समृद्धि बढ़ने पर सोने की मांग बढ़ सकती है, जिससे आयात भी बढ़ेगा।
4) आय : प्रति व्यक्ति आय 1% बढ़ती है तो सोने की मांग भी 1% तक बढ़ जाती है। इसके अलावा शहरीकरण भी तेजी से हो रहा है, जिससे लोगों की आय बढ़ रही है।
5) सोने की कीमत : अगर सोने की कीमत 1% बढ़ती है, तो इसकी मांग 0.5% तक गिर जाती है। इसी तरह से सोने की कीमत 1% कम होती है तो मांग में 0.9% तक का इजाफा होता है। हालांकि, 2005 से 2015 के बीच 10 गुना कीमतें बढ़ने के बाद भी भारत में सोने की मांग 14% की सालाना दर से बढ़ी।
6) महंगाई : अगर महंगाई 1% बढ़ती है तो सोने की मांग में 2.6% इजाफा हो जाता है। दुनियाभर के निवेशक महंगाई से निपटने के लिए सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने में पैसा लगाते हैं। ताकि, कम जोखिम में अच्छा रिटर्न मिल सके।
7) मानसून : सामान्य से 1% ज्यादा बारिश होने पर सोने की मांग 0.5% बढ़ जाती है। क्योंकि, मानसून कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है। अच्छे मानसून से पैदावार बढ़ती है तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी आती है। इससे सोने की मांग बढ़ती है।


ट्रेड वॉर और अनिश्चितता का माहौल, फिर भी सोना सुरक्षित निवेश

  • सोमसुंदरम बताते हैं कि सितंबर में गोल्ड से जुड़े फंड और दूसरे प्रोडक्ट में दुनियाभर में 3.9 अरब डॉलर का निवेश हुआ। इससे दुनिया में सोने की होल्डिंग 75.2 टन बढ़कर 2,808 टन पहुंच गई। यह अब तक का सबसे उच्च स्तर है। इस वक्त सोने की मांग से जुड़े कई सकारात्मक कारक हैं। इनमें ट्रेड वॉर और राजनीतिक अस्थिरता जैसी वजह शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग जांच बैठाने की बात चल रही है। ऐसा हुआ तो चीन अमेरिका से ट्रेड डील में देरी करेगा। वह 2020 में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव तक डील टाल सकता है। ब्रेग्जिट को लेकर भी अनिश्चितता का माहौल है।
  • इनके अलावा दुनियाभर में ब्याज दरें भी कम हैं। वहीं, अमेरिकी शेयर बाजार उच्च स्तरों पर हैं। पिछले सालों के रिकॉर्ड से पता चलता है कि अक्टूबर महीने में अमेरिकी बाजार में तेज गिरावट आती है। पिछले साल अक्टूबर में एसएंडपी 500 इंडेक्स में 7% गिरावट आई थी। दूसरी ओर डॉलर के लगातार मजबूत होने और सोना सस्ता होने की वजह से भारत और चीन में सोने की मांग में तेजी आ सकती है। सभी तरह की वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने में पैसा लगाने की सोच को समर्थन मिलता है।


हम दूसरे बड़े कंज्यूमर, लेकिन हमारे यहां सोने को लेकर व्यापक नीति नहीं

  • सोमसुंदरम ने बताया कि सोने का घर की समृद्धि और देश की संपत्ति में योगदान है। महंगाई से मुकाबले के लिए और नीतिगत मुद्दों की वजह से करंसी में उतार-चढ़ाव से निपटने के लिए सोने में निवेश सबसे अच्छा माध्यम है। यहां तक कि केंद्रीय बैंक भी एसेट्स में विविधता के लिए सोना खरीदते हैं। सोने के बहुत से फायदे हैं। गोल्ड मार्केट में हजारों कारीगरों और अन्य लोगों को रोजगार मिलता है। भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां 75% ज्वेलरी हाथ से बनाई जाती है। वित्तीय संस्थान सोने के बदले लोन देते हैं।
  • भारत में सोने को लेकर व्यापक नीति वाला नजरिया नहीं है। इस तरह हम दुनिया का दूसरा बड़ा गोल्ड कंज्यूमर होने और सदियों पुरानी कुशल कारीगरी की क्षमताओं को कमजोर बना रहे हैं। गोल्ड ट्रेडिंग शुरू करने के करीब 30 साल बाद भी हमारा अपना स्पॉट गोल्ड एक्सचेंज नहीं है। हॉलमार्किंग अभी तक अनिवार्य नहीं की गई है। यह सोने की शुद्धता से जुड़ा बड़ा मुद्दा है। सोने को कारोबार की मुख्यधारा में लाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए। इसकी इमेज लगातार एसेट क्लास वाली बनी हुई है। सोने का रोजगार और जीडीपी में सकारात्मक असर का पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है।

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प्रतीकात्मक फोटो।


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10 महीने में 4400 करोड़ की बम्पर कमाई, सबसे लकी रहे अक्षय, ऋतिक और टाइगर

डीबी ओरिजिनल डेस्क. वर्ष2019फिल्मों की कमाई के लिहाज से अब तकबहुत बेहतर साबित हुआ है। खासकर अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन और टाइगर श्रॉफ के लिए यह साल काफी भाग्यशाली और शानदाररहा। अक्षय ने जहां अपने 32 साल के फिल्मी कॅरिअर में पहली बार 'मिशन मंगल' के साथ में 200 करोड़ के क्लब में एंट्री ली तो वहीं ऋतिक और टाइगर 'वॉर' के साथ पहली बार 300 करोड़ के क्लब में जा पहुंचे।

तरन आदर्श।

बॉलीवुडट्रेड एनालिस्टके मुताबिक, इस साल न केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन बढ़ा है, बल्कि हिट फिल्मों की संख्या में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। ट्रेड एक्सपर्ट तरन आदर्श का मानना है बॉक्स ऑफिस ने यह दौर कई साल बाद देखा है।उन्होंने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा, "इस साल बहुत सारी फिल्में चली हैं। बड़ी संख्या में लोग सिनेमाघरों तक पहुंचे हैं। यह साल पिछले कई सालों के मुकाबले काफी अच्छा रहा है। इस साल हिट की संख्या भी बढ़ी है। यह बॉक्स ऑफिस के लिए बहुत अच्छी बात है।"

कलेक्शन में इजाफे की वजह

आदर्श का मानना है कि बॉक्स ऑफिस पर कहानियां अच्छी आ रही हैं। इस वजह से लोग सिनेमाघरों में जा रहे हैं और बेहतर बॉक्स ऑफिस परिणाम सामने आ रहे हैं।वे कहते हैं, "हमारे फिल्ममेकर्स भी नई-नई और बेहतर कहानियां दर्शकों तक पहुंचाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।"

राज बंसल।

मल्टीप्लेक्स मालिक, फिल्म डिस्ट्रीब्यूटर और एनालिस्ट राज बंसल इस बारे में कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं है कि यह साल पिछले दो-तीन सालों के मुकाबले काफी अच्छा रहा है। फिल्मों का अच्छा बिजनेस होने का मुख्य कारण सरकार द्वारा मनोरंजन पर जीएसटी को 28 से घटाकर 18 फीसदी करना है। इसका सबसे बड़ा फायदा दर्शकों को हुआ। उन्हें फिल्में देखना सस्ता साबित हुआ।" राज दूसरी वजह कंटेंट को मानते हैं। उन्होंने बताया, "कंटेंट किंग है। इसमें कोई दो राय नहीं है। 'उरी' बेहद खूबसूरती से बनाई गई। 'वॉर' से अच्छी एक्शन फिल्म इंडिया ने पिछले 5-10 साल में नहीं देखी। 'मिशन मंगल' में साइंस को बहुत ही खूबसूरती से पारिवारिक परिवेश में ढालते हुए बड़े आसान तरीके से पेश किया गया।"

सिर्फ 10 महीने में 4 हजार करोड़ पार


हिंदी बॉक्स ऑफिस पर इस साल अब तक करीब 195 (27 हॉलीवुड समेत) फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, जिनका साझा कलेक्शन करीब 4418 करोड़ रुपए है। जबकि 2018में 220 फिल्में आई थीं और सभी ने कुल4422.31 करोड़ रुपए कमाए थे।

बॉक्स ऑफिस एनालिसिस।


हॉलीवुड फिल्मों ने भी रिकॉर्ड कमाई की


इस साल बड़ा इजाफा हॉलीवुड फिल्मों की संख्या और कमाई में देखा गया है। पिछले साल जहां कुल 24 हॉलीवुड फ़िल्में आई थीं, जिनसे करीब 757 करोड़ रुपए की कमाई हुई थी। वहीं इस साल सिर्फ 10 महीने में 27 हॉलीवुड फिल्में रिलीज हो चुकी हैं, जिनसे करीब 1053 करोड़ रुपए का कारोबार हिंदी बॉक्स ऑफिस पर हुआ।

बॉक्स ऑफिस एनालिसिस।

पिछले साल पूरे 10 महीने में बॉलीवुड की 18 फिल्में हिट रही थीं, जबकि इस साल अक्टूबर के तीसरे सप्ताह तक ही यह आंकड़ा हासिल हो गया है। चौथे सप्ताह में रिलीज हुईं तीनों फिल्मों 'हाउसफुल 4', 'सांड की आंख' और 'मेड इन चाइना' के हिट होने की संभावना जताई जा रही है। खासकर 'हाउसफुल 4' को लेकर माना जा रहा है कि यह बॉक्स ऑफिस पर 200 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर सकती है।

बॉक्स ऑफिस एनालिसिस।


नवंबर को छोड़कर दिसंबर में तीन बड़ी फिल्में कार्तिक आर्यन, भूमि पेडणेकर और अनन्या पांडे स्टारर 'पति पत्नी और वो', सलमान खान स्टारर 'दबंग 3' और अक्षय कुमार, करीना कपूर स्टारर 'गुड न्यूज' आने वाली हैं। ट्रेड पंडितों की मानें तो ये सभी बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाएंगी।

अतुल मोहन।


ट्रेड एक्सपर्ट अतुल मोहन की मानें तो फिल्मों के लिए साल की आखिरी तिमाही गोल्डन साबित होती है। ज्यादातर फिल्ममेकर्स अक्टूबर से दिसंबर के बीच फिल्में रिलीज करना पसंद करते हैं। उनके मुताबिक, इस साल की आखिरी तिमाही (अक्टूबर से दिसंबर तक) रिलीज हुईं फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर 1000 करोड़ रुपए से ज्यादाका बिजनेस दे सकती हैं। अक्टूबर में अब तक 2 हॉलीवुड समेत करीब 20 फिल्में रिलीज हो चुकी हैं। इनका साझा रूप से बॉक्स ऑफिस कलेक्शन लगभग 387.14 करोड़ रुपए हैं, जिसमें करीब 58.85 करोड़ रुपए हॉलीवुड की दो फिल्मों से आया है।

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और इस मामले में पिछले 6 साल में सबसे पीछे 2019

अगर बॉक्स ऑफिस पर सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की बात करें तो 2019 पिछले 6 साल के सबसे कम स्कोर पर है। इस साल की हाईएस्ट ग्रॉसर 'वॉर' है, जिसने अब तक 301 करोड़ रुपए कमाए हैं। जबकि बीते 5 सालों की हर हाईएस्ट ग्रॉसर फिल्म ने 320 करोड़ रुपए से ज्यादा की कमाई की थी।

बॉक्स ऑफिस एनालिसिस।

10 बड़ी बातें भारतीय फिल्म-टीवी और डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री की

  • फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मीडिया और मनोरंजन उद्योग भी 11.6 फीसदी की दर से लगातार बढ़ रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण देश में तेजी से बढ़ते मोबाइल धारक और इंटरनेट यूजर्स का है।
  • सभी भाषाओं को शामिल करें तो फिल्म इंडस्ट्री का मौजूदा कारोबार 13800 करोड़ रुपए का है, जो कि बीते वर्ष की तुलना में 10 फीसदी ज्यादा है। अगले वर्ष तक भारतीय फिल्म बाजार 25,787 करोड़ रुपए तक पहुंचने की संभावना है।
  • इनमें हिंदी फिल्मों का योगदान करीब 43 फीसदी तक है, जबकि क्षेत्रीय भाषाएं रेवेन्यु में 50 फीसदी हिस्सेदार हैं।
  • क्षेत्रीय फिल्मों के बाजार में दक्षिण भारतीय फिल्मों की हिस्सेदारी 36 फीसदी है। फिल्मों का असर मार्केटिंग पर भी नजर आ रहा है।
  • वर्ष 2018 में सिर्फ भारतीय फिल्मकारों ने ही करीब 606 करोड़ रुपए फिल्मों की मार्केटिंग में खर्च किए। इस राशि का 75 फीसदी तक सिर्फ टेलीविजन और डिजिटल में ही खर्च किया गया।
  • 285 करोड़ रुपए के साथ 47 फीसदी की हिस्सेदारी टेलीविजन और 28 फीसदी के साथ 170 करोड़ रुपए डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खर्च किए गए।
  • भारतीय फिल्मों की यह सफलता दर तब है, जबकि फिल्मकारों को 30 से ज्यादा अलग-अलग संस्थानों से 70 से ज्यादा स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं।
  • टीवी के प्रति भी लोगों का रुझान बढ़ता ही जा रहा है। पिछले वर्ष इसमें 12 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई।
  • टीवी इंडस्ट्री वर्ष 2017 के 660 अरब रुपए के कारोबार से बढ़कर 2018 में 740 अरब रुपए की हो गई।
  • मीडिया और इंटरनेटमेंट के दूसरे सेक्टर्स की तरह ही डिजिटल मीडिया में भी 42 फीसदी की बढ़त पिछले वर्ष दर्ज की गई। इस उद्योग का कुल रेवेन्यु 169 अरब रुपए रहा।


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Diwali Special 2019: Bollywood Hollywood Movies Box Office Collection; Highest-Grossing Bollywood-Hollywood Films


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Tuesday, October 22, 2019

शिवकाशी में इस बार 98% पटाखे पुराने तरीके से ही बन रहे हैं, 2 हजार में से सिर्फ 4 के पास ग्रीन पटाखे बनाने का लाइसेंस

शिवकाशी (मनीषा भल्ला).तमिलनाडु के मदुरई से कन्याकुमारी जाते हुए एनएच-47 पर शिवकाशी कस्बा है। निरंतर चलने वाली औद्योगिक गतिविधियों के कारण इसे भारत का कुटी जापान यानी मिनी जापान भी कहा जाता है। शिवकाशी की सबसे बड़ी पहचान पटाखा उद्योग है। देश के 90% पटाखे यहीं बनते हैं। दीवारों पर लगे पोस्टर बताते हैं कि आप पटाखों की दुनिया में हैं। लेकिन इनमें से एक भी ‘ग्रीन पटाखों’ का पोस्टर नहीं है, क्याेंकि यहां बने पटाखों में 2% से भी कम ग्रीन पटाखे हैं। यहां 98% पटाखे पुराने फॉर्मूले से ही बनाए जा रहे हैं। दरअसल, यहां सिर्फ चार कंपनियों को ही इसका लाइसेंस दिया गया है। जिस केमिकल को प्रतिबंधित किया गया है, उसका ग्रीन विकल्प पोटेशियम पेरियोडेट 400 गुना महंगा है, जिसके चलते निर्माताओं ने कम ग्रीन पटाखे बनाए।

शिवकाशी में फिलहाल हर तरफ पटाखे ही दिख रहे हैं। दिवाली के चलते पटाखे सप्लाई करने का काम जोरों पर है। शिवकाशी में रजिस्टर्ड पटाखा निर्माताओं की संख्या 1070 हैं और छोटे-बड़े मिलाकर 1800 से लेकर 2000 इकाइयां पटाखे बनाती हैं। बीते वर्ष यहां पटाखों के व्यापार का टर्नओवर 6500 करोड़ रुपए रहा। सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बाद यह लगातार गिर रहा है। बीते पांच सालों में टर्नओवर 60 फीसदी कम हुआ है।

हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं

  • शिवकाशी में कंट्रोलर ऑफ एक्सप्लोसिव ऑफिसर डॉ. करुणामय पांडे बताते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों में इस्तेमाल होने वाले 6 केमिकल पर पाबंदी लगाई है। यह बेरियम नाइट्रेट, एंटीमोनी, लिथियम, मर्करी, आर्सेनिक और लेड हैं। इनमें बेरियम नाइट्रेट सबसे खतरनाक है और इस पर सख्ती से पाबंदी लगाने के लिए कहा गया है।’
  • श्रीबालाजी फायर वर्क्स के मालिक कनन कहते हैं ‘हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, इसलिए ग्रीन पटाखों का लाइसेंस लिया है, लेकिन सस्ते बेरियम नाइट्रेट के बिना ग्रीन पटाखे बनाना काफी महंगा होगा।’ कनन बताते हैं कि बेरियम नाइट्रेट के बिना ग्रीन पटाखे में केवल फुलझड़ी, अनार, पेंसिल, चकरी और लड़ी बनाए जा सकते हैं लेकिन इनकी मांग बहुत कम है। अगर यही नहीं बिके, तो नुकसान उठाना पड़ेगा। समस्या यह है कि 70 रुपए किलो के बेरियम नाइट्रेट की जगह 3000 रुपए किलो वाले पोटेशियम पेरियोडेट के इस्तेमाल का सुझाव दिया गया है। ऐसे में ग्रीन पटाखों का दाम इतना बढ़ जाएगा कि खरीदार नहीं मिलेंगे।
  • नेशनल एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (नीरी) की चीफ साइंटिस्ट डॉ. साधना रायालु बताती हैं कि ग्रीन पटाखों पर रिसर्च जारी है। शिवकाशी में 250 निर्माताओं ने फॉर्मूले के लिए आवेदन दिया था, जिनमें से 165 के साथ अनुबंध किया गया है। पेट्रोलियम, एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (पेसो) से शिवकाशी के 4 निर्माताओं को लाइसेंस मिले हैं। इस पर शिवकाशी से कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर कहते हैं ‘लोकसभा चुनाव से पहले चार महीने तक पूरा शिवकाशी अदालत के फैसले के विरुद्ध बंद रहा है। इस साल कुछ भी साफ नहीं था कि कौन से पटाखे बनेंगे। नीरी ने जब फॉर्मूला दिया उस कम समय में ग्रीन पटाखे बन ही नहीं सकते थे।

इस बार खास होंगे ये पटाखे
शिवकाशी में ग्रीन पटाखों से अलग इस बार फैंसी पटाखों की नई रेंज पर काम किया गया है। मोरको जैसे आसमान में फटने वाले पटाखों की कई वैराइटी इस बार देखने को मिलेंगी। जैक एंड जिल, ग्लेजी बूम और जोडियक जिग्लर्स जैसे 100 शॉट्स वाले पटाखे भी पहले से ज्यादा शॉट्स के साथ मिलेंगे।

चिंता भविष्य की
शिवकाशी की सबसे पुरानी तमिलनाडु फायरवर्क्स, अमोर्सेस मैन्युफैक्चरर एसोसिएशन के अध्यक्ष गणेशन शिवकाशी के भविष्य पर चिंतित है। इन्हें आशंका है कि ग्रीन पटाखों के चलते व्यापार खत्म होता है, तो आर्थिक और सामाजिक ताना-बाना बिगड़ जाएगा। माइग्रेशन भी बढ़ेगा।



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शिवकाशी में पटाखा उद्योग से आठ लाख लाेगों को रोजगार मिलता है। फोटो: आर महेश कुमार


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Friday, October 18, 2019

मुस्लिम पक्षकार ने कहा- फैसला पक्ष में आए, तब भी विवादित स्थल पर दोबारा मस्जिद की बुनियाद न पड़े

अयोध्या से रवि श्रीवास्तव.राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के दूसरे दिन अयोध्या में कोई खास हलचल नहीं दिखी। हालांकि, पर्यटकों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। संवेदनशील जगहों पर पुलिस रूटीन चेकिंग में लगी हुई है। दैनिक भास्कर APP से बातचीत में मुस्लिम पक्षकारों ने कहा कि यदि मुस्लिमों के पक्ष में कोर्ट का फैसला आ भी जाता है तो हमारी मस्जिद बनाने की अभी कोई तैयारी नहीं है। वहीं, मुद्दई हाजी महबूब का कहना है कि मेरी दिली तमन्ना है कि हम अगर केस जीत जाते हैं तो उस जमीन को घेरकर सिर्फ छोड़ देंगे। अमन चैन के लिए वहां अब मस्जिद की बुनियाद नहीं पड़नी चाहिए।

सुबह के तकरीबन 10 बजे रहे थे, जब दैनिक भास्कर APP की टीम टेढ़ी बाजार पहुंची तो रोज की तरह वहां बैरिकेडिंग लगी हुई थी। लगभग चार मकान छोड़कर हाजी महबूब अपने घर के आंगन में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। साथ में दो सुरक्षाकर्मी और कुछ मिलने वाले बैठे थे। हाजी महबूब ने बताया कि देश को तबाही से रोकने के लिए और अमन शांति कायम रखने के लिए मैं नहीं चाहूंगा कि वहां फिर से मस्जिद की बुनियाद पड़े। हम उस जगह को घेरकर छोड़ देंगे। इससे सभी पक्ष खुश रहेंगे। ये मेरी दिली तमन्ना है। अभी फैसला नहीं आया है, लेकिन हमारी मस्जिद बनाने की कोई तैयारी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानेंगे
कजियाना मोहल्ले में रहने वाले मुद्दई इकबाल अंसारी गुरुवार सुबह 11 बजे मीडियाकर्मियों से घिर गए। बातचीत खत्म होने के बाद कुछ लोगों ने उनके साथ तस्वीर खिंचाने की इच्छा जाहिर की। अंसारी की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। अब उनके साथ 4 सुरक्षाकर्मी रहते हैं। हालांकि, अंसारी ने बताया कि अब सुप्रीम कोर्ट जो फैसला देगा वह माना जाएगा। अब उस फैसले के खिलाफ हम कोर्ट नहीं जाएंगे।

मुद्दई कोई तथ्य नहीं देता, वकील रिसर्च करते हैं: अंसारी
अंसारी ने बताया कि मुस्लिम पक्ष के मुख्य वकील राजीव धवन से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई है, न ही कभी बात हुई, न ही कभी वे दिल्ली गए हैं। जो भी लिखा-पढ़त होती है, वह जफरयाब जिलानी के माध्यम से होती है। वे ही हमारे वकील हैं। मुद्दई कोई तथ्य नहीं देता, बल्कि वकील खुद रिसर्च करते हैं।

हजार लोग हर दिन शिलाओं को देखने पहुंच रहे
विहिप की कार्यशाला में मंदिर के लिए तैयार शिलाओं को देखने के लिए भीड़ लगातार बढ़ रही है। विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा का कहना है कि इस समय रोजाना 1000 के करीब लोग यहां आ रहे हैं। वहीं, विहिप के केन्द्रीय मंत्री राजेंद्र सिंह पंकज भी गुरुवार को वहां पहुंचे। जब उनसे पूछा गया कि क्या पिछली बार की तरह कोई कारसेवा की जाएगी, तो उनका जवाब था कि हम अब ऐसा कोई काम नहीं करेंगे, जिससे देश में अमन-चैन बिगड़े। उन्होंने कारसेवा से पूरी तरह इनकार कर दिया।

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अयोध्या मामले में मुस्लिम पक्षकार हाजी महबूब।


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2015 में अंबानी से अमीर बनने पर असहजता महसूस की थी: दिलीप संघवी

नई दिल्ली. मैग्नीफिसेंट एमपी में शिरकत कर रहे दिलीप संघवी ने 36 साल पहले पांच साथियों के साथ सन फार्मा नाम की दवा कंपनी की शुरुआत की थी। आज इस कंपनी की उपस्थिति 50 देशों में है। 32 हजार कर्मचारी इससे जुड़े हैं। साल 2015 में मार्केट वैल्यू के हिसाब के आधार पर दिलीप कुछ समय के लिए मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ भारत के सबसे धनी व्यक्ति भी बने थे। सन फार्मा को दुनिया की शीर्ष चार दवा कंपनियों में शुमार करने वाले संघवी ने दैनिक भास्कर के पवन कुमार से विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की।

भास्कर: सन फार्मा को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी जेनेरिक फार्मा कंपनी बनाने में कैसे कामयाब हुए?
संघवी: सन फार्मा की प्रगति एक-एक कदम आगे बढ़ कर हुई है। इसमें कर्मचारियों की कड़ी मेहनत और लगन सबसे महत्वपूर्ण है। हमने 1983 में पांच लोगों से कंपनी शुरू की थी। आज हमारे साथ 32 हजार से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे बहुत प्रतिभाशाली और प्रतिबद्ध लोग मिले। मुझे गर्व है कि वर्ष-2019 में फोर्ब्स की सूची में सन फॉर्मा को जगह मिली।


भास्कर: आप 2015 में मुकेश अंबानी से बड़े भारतीय कारोबारी बने थे। तब आपकी क्या प्रतिक्रिया थी?
संघवी: 2015 से पहले फार्मा कारोबार के बाहर बहुत कम लोग ही मुझे जानते थे, भले ही उन्हें सन फार्मा के बारे में जानकारी रही होगी। लेकिन इसके बाद मेरे बारे में लोगों की दिलचस्पी पैदा हो गई। मैं उनकी निगाहों में आ गया था और इससे मैं बहुत असहज महसूस कर रहा था।

भास्कर: भारत सहित दुनियाभर की अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुजर रही है। आपका क्या मानना है?
संघवी: पिछले कुछ वर्षों में भारतीय फार्मा उद्योग के विकास में अलग-अलग कारणों से गिरावट आई है। उद्योग मूल रुप से निर्यात पर निर्भर कर रहा है। अमेरिका में जेनेरिक दवाओं की कीमतों को लेकर पिछले तीन वर्षों से जबरदस्त दबाव है। क्योंकि खरीददार संगठित हो रहे हैं इसलिए कीमतों में प्रतिस्पर्धा आ रही है। सुस्ती के दौर में भारतीय दवा उद्योग भी आर्थिक अस्थिरता के दौर गुजर रहा है।

भास्कर: सरकार से क्या अपेक्षाएं हैं?
संघवी: जैसे-जैसे फार्मा उद्योग का प्रोडक्ट पोर्टफोलियो कांप्लेक्स और विशेषज्ञता की ओर बढ़ेगा उसी हिसाब से अत्यंत कुशल लोगो की मांग बढ़ेगी। सरकार प्रतिभा का पूल बनाने में मदद कर सकती है जो इन विशेष उत्पादों को बनाने में कुशल हो।आधुनिक इकोसिस्टम को बढ़ावा देने की जरूरत है जिसमें शोध और विकास को बढावा मिले। भारत को लाइफ साइंस का केंद्र बनाने के लिए इसकी जरूरत है। इसके अलावा उद्योग को सरकार की ओर से सहयोगी नियमन वातावरण देने की आवश्यकता है। सरकार को हेल्थकेयर प्रोग्राम में तेजी लानी होगी ओर इसके लिए डिजिटल टेक्नोलॉजी के सहारे हेल्थकेयर ढांचे को मजबूत करना होगा।

भास्कर: आपको घाटे में चल रही कंपनियों को खरीद कर उनकी कायापलट करने का माहिर माना जाता है, क्या ये आपकी कोई बिजनेस स्ट्रैटजी है?
संघवी: हमारे अधिग्रहण, कम और ऊंची कीमतों का मिश्रण रहे हैं। हमारे आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार कुछ मामलों में अधिग्रहण महंगे साबित हुए लेकिन हमें कामयाबी मिली और कुछ मामलों में उलट बात साबित हुई। अधिग्रहण से पहले हम इस बात का आकलन करने में बहुत समय लगाते हैं कि हम कंपनी बनाएं या खरीदें। अगर हमें लगता है कि खुद की कंपनी खड़ी करना उचित है तो हम वह रास्ता अपनाते हैं। हमारा बुनियादी दर्शन यह रहा है कि कंपनी को मूल्यवान बनाएं और उसकी तरक्की करें।

भास्कर: रेनबैक्सी का कायापलट कैसे किया?
संघवी: मेरा ऐसा मानना है कि जीवन में हर आदमी आगे बढ़ना और सफल होना चाहता है और इसके लिए कड़ी मेहनत करता है। लोगों को सिर्फ सहयोग, सलाह और दिशा की जरूरत होती है। रेनबेक्सी में जबरदस्त प्रतिभाशाली लोग थे।

भास्कर: जेनेरिक दवा के बारे में आपकी क्या राय है? जेनेरिक दवा पर लोगों का भरोसा कम क्यों है?
संघवी: मैं इससे सहमत नहीं हूं कि जेनेरिक दवा में लोगों का विश्वास नहीं है। अमेरिका, चीन और यूरोप जैसे सख्त कानूनों के दायरों में काम रहे बाजारों में भी जेनेरिक दवा का हिस्सा 60 से 80 फीसदी है और ये प्रोडक्ट कड़े क्वालिटी मानकों पर खरे हैं। जैसे-जैसे सरकारें हेल्थकेयर का बोझ कम करने की दिशा में काम कर रही है वैसे-वैसे जेनेरिक दवा का बाजार और बढ़ेगा।

भास्कर: धारणा है कि दवा कंपनियां ग्राहकों से मनमाना कीमत वसूल करती हैं। ब्रांड बदलने से एक ही दवा की कीमत कई गुना बढ़ जाती है। ऐसा क्यों?
संघवी: मुझे ऐसे किसी प्रोडक्ट की जानकारी नहीं है जिसकी कीमत हजार गुना बढ़ गई हो। भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया में सबसे कम हैं। सरकार ने सुनिश्चित किया है कि जरूरी दवाएं कम कीमत पर मिले और इन दवाओं को ड्रग कंट्रोल प्राइस ऑर्डर में शामिल किया गया है। मुझे लगता है कि फार्मा कंपनियों, सरकार और नियामक एजेंसियों को देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार के लए काम करना होगा।

भास्कर: अक्सर किसी उद्योगपति को उसकी नेट वर्थ से बड़ा या छोटा आंका जाता है। इस तरह के मूल्यांकन को किस रूप में देखते हैं?
संघवी: किसी कंपनी के शेयरों की कीमत घटती-बढ़ती रहती है। मेरे हिसाब से किसी कंपनी को इस बात से आंकना चाहिए कि उससे जुड़े लोगों का जीवन वह कैसे प्रभावित करती है। समाज के प्रति उसकी प्रतिबद्धता क्या है, वह अपने कर्मचारियों का ख्याल कैसे रखती है।

भास्कर: आपने 1997 में पहली बार एक अमेरिकी कंपनी का अधिग्रहण किया, विदेशी कंपनियों की खरीदारी के क्या अनुभव रहे?
संघवी: समय के साथ के हम बड़ी कंपनियों को एकीकृत करने की क्षमता हासिल करने में माहिर हो गए हैं। मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि कर्मचारियों को बहुत बड़े ख्वाब न दिखाएं बल्कि उन्हें कंपनी का हिस्सा बनाएं। यही हमारी उनके लिए सबसे बड़ी हौसला अफजाई है।



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दिलीप संघवी। -फाइल फोटो


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स्टेंट जैसी डिवाइस में खराबी से मौत पर उम्रकैद की जगह सिर्फ 3 साल तक की सजा का प्रस्ताव

नई दिल्ली (पवन कुमार).देश में स्टेंट, हार्ट वॉल्व, घुटना, हिप जैसे मेडिकल डिवाइस के कारोबार और मरीजों के हितों को लेकर नया कानून बनाने की तैयारी है। नीति आयोग ने इस नए कानून मेडिकल डिवाइसेज (सेफ्टी, इफेक्टिवनेस एंड इनोवेशन) बिल-2019 का ड्राफ्ट तैयार किया है। मौजूदा कानून में इम्प्लांट की खराबी से अपंगता या मरीज की मौत पर दोषी को उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है।

नए मसौदे में इसी अपराध के लिए अधिकतम तीन साल तक की सजा का प्रस्ताव रखा गया है। न्यूनतम सजा का जिक्र नहीं है।ऐसे में दोषी जुर्माना देकर भी बच सकता है। इस ड्राफ्ट पर फिलहाल आंतरिक चर्चा के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय से राय मांगी गई है। जल्द ही इस ड्राफ्ट को लेकर नीति आयोग के अफसरों और विशेषज्ञों की अहम बैठक होगी।

फाइनल ड्राफ्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजा जाएगा

आयोग सभी सिफारिशों के अनुरूप संशोधन करने के बाद फाइनल ड्राफ्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजेगा। कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे संसद में पेश किया जाएगा।स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक नया कानून बनने पर मरीजों को भी लाभ मिलेगा। डिवाइस कारोबार में प्रतिस्पर्धा बढ़ने से इनकी कीमतें घट सकती हैं।

मेडिकल डिवाइस को चार श्रेणी ए, बी, सी और डी में बांटा गया
नए ड्राफ्ट के मुताबिक मेडिकल डिवाइस का कारोबार करने के लिए अब लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। सिर्फ सर्टिफिकेट लेकर कारोबार किया जा सकेगा। मेडिकल डिवाइस को चार श्रेणी ए, बी, सी और डी में बांटा गया है। मेडिकल डिवाइसेज एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से नोटिफाई की गई संस्था कानून में तय नियम और शर्तों के अनुसार सर्टिफिकेट देगी। मेडिकल डिवाइसेज को बाजार में लाने से पहले कंपनियों को अपने प्रोडक्ट को मेडिकल डिवाइस के नेशनल रजिस्टर में पंजीकृत कराना होगा। कम रिस्क वाली सामग्री जैसे रुई-पट्‌टी आदि को ए श्रेणी में रखा गया है। इसके लिए सर्टिफिकेट की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। सिर्फ स्व प्रमाणित घोषणा पत्र दाखिल करना होगा। उल्लेखनीय है कि देश में मेडिकल डिवाइस का सालाना कारोबार करीब 40 हजार करोड़ रुपए का है।


डिवाइस खराब मिली तो कंपनी बाजार से वापस लेगी
डिवाइस को लेकर यदि मरीज या डॉक्टरों की तरफ से शिकायत मिलती है, तो गड़बड़ी की जांच विशेष समिति करेगी। यदि समिति की जांच में डिवाइस में गड़बड़ी साबित हुई तो उस कंपनी को मार्केट से अपने सभी डिवाइस को वापस लेना होगा। इस ड्राफ्ट में डिवाइस की खराबी से प्रभावित मरीजों को मुआवजा भी मिलेगा। हालांकि मुआवजे की राशि तय करने की प्रक्रिया अभी चल रही है।

DBApp



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प्रतीकात्मक फोटो।


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एक्सपर्ट्स का दावा- आर्य बाहर से नहीं आए, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में ही निवास करते थे

डीबी ओरिजिनल डेस्क. अयोध्या मामले में 40 दिन चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। सुप्रीमकोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भारत में आर्यों का अस्तित्वफिर से चर्चा में आया। सुनवाई के दौरान हिंदू पक्षकार के वकील के पाराशरण ने कहा किएक के बाद एक आक्रांताओं ने भारत पर हमला किया। आर्य यहां के मूल निवासी थे, क्योंकि रामायण में भी सीता अपने पति श्रीराम को आर्य कहकर संबोधित करती हैं। ऐसे में आर्य कैसे बाहरी आक्रमणकारी हो सकते हैं?


कुछ ही दिनों पहले डेक्कन कॉलेज पुणे के इतिहासकारों ने मानव कंकालों पर किए गए शोध के नतीजे घोषित किए थे। ये मानव कंकाल हरियाणा केराखीगढ़ी में खुदाई में मिले थे। राखीगढ़ी सिंधु सभ्यता के मुख्य स्थान में से एक रहाहै। शोध के मुताबिक, दक्षिण एशिया के लोगों का खून एक ही है। हड़प्पा में रहने वाले बाहर से नहीं आए थे, बल्कि ये यहीं के वाशिंदे थे। इन्होंने ही वेदों-उपनिषदों की रचना की।इन्हें ही आर्य के नाम से भी जाना जाता है। यही लोग बाद में मध्य एशिया की ओर गए। उनका दावा है कि अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर अंडमान तक के लोगों के जीन एक ही वंश के थे।इस शोधकार्य को देश-विदेश के 30 वैज्ञानिकों की टीम ने अंजाम दिया था। इनमें डेक्कन कॉलेज के पूर्व कुलपति और इस प्रोजेक्ट के मुखिया डॉ वसंत शिंदे और बीरबल साहनी पुराविज्ञानी संस्थान, लखनऊ के डॉ. नीरज राय (डीएनए वैज्ञानिक) भी शामिल थे।

सुप्रीम कोर्ट में कही गई बात और मानव कंकालों पर किए गए शोध के बाद दैनिक भास्कर APP ने शोधकरने वालेदोनों वैज्ञानिकों से बात कर जाना कि आखिर आर्यों को लेकर उनकीपूरी थ्योरी क्या है। इस शोध को प्रतिष्ठित शोध पत्रिका सेल में प्रकाशित किया गया है। जिसका शीर्षक है ‘एन एनोसेंट हड़प्पन जीनोम लैक्स एनसेस्ट्री फ्रॉम स्टेपे पेस्टोरेलिस्ट और ईरानी फार्मर्स'।

आर्यों को लेकर गलतफहमी- डॉ. वसंत शिंदे

कई विद्वानों ने दावा किया है कि, आर्य बाहर से भारतीय उपमहाद्वीप में आए थे।


‘‘काफी विद्वानों का मत है कि आर्य बाहर से भारत आए थे। कुछ ये भी कहते हैं कि वे हड़प्पा सभ्यता के बाद यहां आए। कुछ का कहना है कि उन्होंने यहां रहने वालों पर हमला किया और अतिक्रमण कर दिया। कुछ का मानना है कि उत्तर भारतीयों पर हमला करके आर्यों ने उन्हें दक्षिण भेज दिया। हालांकि, ये सभी अवैज्ञानिक प्रमाण हैं। अलग-अलग वैज्ञानिकों की अलग-अलग थ्योरी है, लेकिन अपनी बातों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण देने में कोई भी सफल नहीं रहा। हम वैज्ञानिक तथ्यों के साथ यह दावा कर रहे हैं कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए बल्कि वे भारतीय उपमहाद्वीप में ही निवास करते थे। यहीं उन्होंने धीरे-धीरे प्रगति की। जीवन को उन्नत बनाया और फिर इधर-उधर फैल गए।’’

आप यह दावा किन प्रमाणों के आधार पर कर रहे हैं?

अध्ययन आर्कियोलॉजिकल डाटा और जेनेटिक पर आधारित है।


‘‘हमारा अध्ययन आर्कियोलॉजिकल डाटा और जेनेटिक पर आधारित है। आर्कियोलॉजिकल शोध से पता चला कि शुरुआत ईसा पूर्व 7 हजार के आसपास हुई। वहां से हड़प्पा सभ्यता तक एक विकास पाते हैं। शुरुआत में काफी चीजें बनीं। धीरे-धीरे जीवन स्थिरता की ओर बढ़ना शुरू हुआ। विकास शुरू हुआ। हड़प्पा सभ्यता की शुरुआत ईसा पूर्व साढ़े पांच हजार के आसपास हुई। यानी करीब डेढ़ हजार सालों में काफी कुछ विकसित हुआ। उन्नत हुआ। आर्कियोलॉजिकल डाटा को बनाने में जो अवशेष मिले हैं, उनका अध्ययन किया गया है। इसमें औजार, गहने, अलग-अलग क्राफ्ट मिलते हैं। क्राफ्ट में एक प्रगति मिलती है। हड़प्पा सभ्यता के समयइन लोगों ने विकास किया। उनके काम में परफेक्शन आया।’’

आर्यों के औजार, गहने, अलग-अलग क्राफ्ट मिलते हैं।

‘‘हमारा दूसरा अध्ययन जेनेटिक डाटा को लेकर है। ईसा पूर्व 2500 के आसपास के कंकाल हैं। राखीगढ़ी जो हड़प्पा सभ्यता के एक प्रमुख स्थानों में से एक रहा है, वहां से 2015-16 में हमें खुदाई में 40 कंकाल मिले। इनमें से जलवायु के चलते अधिकतर कुछ काम के नहीं निकले लेकिए एक कंकाल काम का था। यह किसी महिला का था। कंकाल के जीन का हमने परीक्षण किया। जब इस जीन की तुलना दूसरे समकालीन लोगों के जीन से की गई तो दोनों एकदम अलग निकले। शोध में किसी भी मध्य एशिया के पूर्वजों के डीएनए का मिलान नहीं हुआ। इससे पता चलता है कि राखीगढ़ी के रहने वाले लोगों का मध्य एशिया के लोगों से कोई संबंध नहीं है जबकि अफगानिस्तान से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर अंडमान तक के लोगों के जीन से मिलान करने पर पता चला कि यह एक ही वंश के हैं। इससे साबित होता है कि आर्य भारत के ही थे, और हम आर्यों के ही वंशज हैं।’’

आर्यों के बड़े पैमाने पर बाहर से आने के प्रमाण मिलते हैं?

आर्यों ने शिकार के बाद जीवन यापन के लिए खेती शुरू की।


‘‘अध्ययन में सामने आया है कि, आर्यों ने जीवन में स्थिरता लाने के लिए खेती की शुरूआत की। इसी के बाद अलग-अलग देशों से उनके व्यापारिक संबंध बनना शुरू हुए। वे दूसरे देशों में व्यापार के लिए जाने लगे और दूसरे देश के लोग भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापार के लिए आने लगे। ईरान, मध्य एशिया से उनके व्यापारिक संबंध थे। आर्यों का विदेशियों से मिलाप तो हुआ लेकिन वंश नहीं बदला। लोग आपस में मिलने लगे। थोड़े से जीन आ गए लेकिन वंश नहीं बदला। ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते कि आर्य बड़े पैमाने पर बाहर से आए हों।’’

हड़प्पा सभ्यता खत्म क्यों हुई?

वैज्ञानिकों का तर्क है कि हड़प्पा सभ्यता जलवायु परिवर्तन के चलते समाप्त हुई।


‘‘हड़प्पा सभ्यता के खत्म होने का कारण जलवायु परिवर्तन रहा। 2,000 ईसा-पूर्व के आसपास पर्यावरण शुष्क होने लगा। इससे सिर्फ हड़प्पा ही नहीं बल्कि मिस्र, मेसोपोटामिया की तत्कालीन सभ्यताओं का भी पतन हुआ। वहां बहने वाली सरस्वती सूखने लगी। इसी कारण सूखे की समस्या खड़ी हुई और लोगों ने वहां से निकलना शुरू कर दिया। हमें मॉडर्न पॉपुलेशन के डीएनए बताते हैं कि सबके डीएनए हड़प्पन जीन से मिलते हैं। उन्नति करने पर वे शिकार से कृषि की ओर बढ़े। वे सिंधु और सरस्वती नदी के आसपास बसे थे।’’

अध्ययन में कौन-कौन शामिल रहा?
डॉ. शिंदे के मुताबिक- हमने अपना अध्ययन वर्ष 2008-2009 में शुरू किया था। भारत के साथ ही इसमें 16 देशों के वैज्ञानिकों को शामिल किया गया। पहले हमने फरमाना में अध्ययन किया। वहां सफलता नहीं मिलने पर राखीगढ़ी में अध्ययन शुरू किया। खुदाई में 40 कंकाल प्राप्त हुए। इन्हीं में से एक पर अध्ययन किया गया। हमने शुरुआती सैम्पल्स की जांच हैदराबाद स्थित लैब में करवाई। इसके बाद अध्ययन को ओर ज्यादा प्रमाणित करने के लिए हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक को भी इसमें शामिल किया। वहां की उन्नत लैब में भी डीएनए सैम्पल का अध्ययन किया गया। दोनों जगह नतीजे एक ही आए।

हमारे लोगों में आज भी है हड़प्पावासियों वाला जीन : डॉ राय

डाॅ राय की तस्वीर।

  • डीएनए साइंटिस्ट डॉ. नीरज राय ने दैनिक भास्कर मोबाइल APP से बातचीत करते हुए कहा किहमने हड़प्पा के एक प्राचीन जीनसमूह का मिलान सेंट्रल एशिया, मिडिल ईस्ट, ईस्टर्न यूरोप, वेस्टर्न यूरोप आदि के लोगों से कराया लेकिन मिलान नहीं हुआ। वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 2500 लोगों के ब्लड सैंपल लेकर उनका डीएनए और राखीगढ़ी में मिले मानव कंकाल के डीएनए का मिलान किया तो पाया कि आज भी उनका और हमारा डीएनए मेल खाता है। डॉ राय के मुताबिक, इससे ये साबित होता है कि हड़प्पावासी कहीं बाहर से नहीं आए थे बल्कि हमारे ही देश के मूलनिवासी थे।
  • ‘‘उन्होंने ही खेती की खोज की। इन्हीं के समय वेद भी लिखे गए। अब यदि कोई आर्य शब्द जैसा टर्म इस्तेमाल करता है तो हम कह सकते हैं कि यही आर्य थे। डॉ राय के मुताबिक, हम ऐसा मानते हैं कि डीएनए की डायवर्सिटी जहां ज्यादा होती है, वहां से लोग कम डायवर्सिटी की ओर जाते हैं। शोध में राखीगढ़ी में रहने वालों लोगों के डीएनए में डायवर्सिटी ज्यादा मिली। इससे ये पता चलता है कि यहां के लोग विदेशों में गए न कि वहां के लोग यहां आकर बसे। वे कहते हैं कि, 1500 बीसी से पहले तक मिक्सिंग नहीं हुई है। 1000 से 1500 बीसी के बीच वाले 500 सालों में काफी मिक्सिंग के साक्ष्य मिलते हैं।’’

बड़ी संख्या में हुआ आबादी का पलायन: टोनी जोसेफ

टोनी जोसेफ

  • 'अर्ली इंडियंस : द स्टोरी ऑफ आउर ऐन्सेस्टर्ज़ एंड वेर वी केम फ्रॉम' के लेखक टोनी जोसेफ ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा किनिष्कर्ष सिर्फ यह बताते हैं कि हड़प्पा के निवासियों के प्राचीन डीएनए में आर्य वंश का कोई संकेत नहीं है। इससे पता चलता है कि आर्य हड़प्पा सभ्यता के समय मौजूद नहीं थे। वे इसके बाद भारत आए। क्या अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को नीचा दिखाने के लिए आर्य सिद्धांत इस्तेमाल किया गया? इस सवाल पर वे कहते हैं कि बिल्कुल नहीं। बल्किमामला इसके विपरीत है। आर्य प्रवास थ्योरी के मुताबिक, आर्य हड़प्पा सभ्यता के अंत में पहुंचे। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत अपने समय की सबसे बड़ी सभ्यता था। क्षेत्रफल और जनसंख्या दोनों ही लिहाज से। आर्यों के आने से पहले! इसलिए यह कहना कि अंग्रेजों ने आर्य प्रवास की थ्योरी भारत को विकृत करने के लिए दी, यह गलत है।
  • वे कहते हैं कि नए जेनेटिक प्रमाण बताते हैं कि यूरोप और दक्षिण एशिया दोनों में ही मध्य एशिया से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ था। जिन्होंने उनकी जनसांख्यिकी को प्रभावित किया। वे कहते हैं कि आज दुनिया की सभी बड़ी आबादी जैसे, यूरोपीय, अमेरिकी, पूर्वी एशियाई, पश्चिम एशियाई सभी प्रागैतिहासिक काल में बड़े स्तर पर हुए पलायन का ही परिणाम हैं। इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक, चौंकाने वाला या अनोखा नहीं है। भारतीय आबादी भी प्रागैतिहासिक काल में हुए बड़े पलायन का ही परिणाम है। वास्तव में ऐसा नहीं है तो यह आश्चर्य की बात होगी!


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DNA study challenges Aryan invasion theory


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